डर का अंत : बेड़ियों से बोध तक


"डर कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे भगाया जा सके। डर हमारे अपने ही अज्ञान की परछाई है। हम पूरी उम्र डरे रहते हैं—कभी समाज से, कभी अकेलेपन से, कभी अपनों को खोने से और कभी अपनी ही 'छवि' के गिर जाने से।

पर क्या हमने कभी रुककर पूछा है कि यह डर खड़ा कहाँ है?

बेड़ियाँ:

ये बेड़ियाँ लोहे की नहीं होतीं, ये तो 'मान्यताओं' की होती हैं। समाज ने हमें बताया कि तुम 'शरीर' हो, तुम 'स्त्री' हो, तुम्हें 'मर्यादा' में रहना है। हमने उन पिंजरों को ही अपना घर मान लिया। डर वहीं पैदा होता है जहाँ हम कुछ 'पकड़' कर बैठ जाते हैं। जब तक हम अपनी पहचान को इन बाहरी ढांचों से जोड़कर रखेंगे, तब तक डर हमें नचाता रहेगा।

बोध का मार्ग:

डर का अंत लड़ने से नहीं, देखने से होता है। बोध का अर्थ है—यह जान लेना कि जिसे मैं 'मैं' कह रही हूँ, वह तो उधार के विचारों का ढेर है। 

मुक्ति की पुकार:

यह ब्लॉग एक निमंत्रण है—उन बेड़ियों को पहचानने का जिन्हें हम 'संस्कार' और 'सुरक्षा' समझ बैठे हैं। असली सुरक्षा बाहर नहीं, भीतर के उस शून्य में है जहाँ कोई 'अहंकार' नहीं बचता।

"उम्र भर सींखचों (पिंजरे की लोहे की सलाखें ) को सहलाया कि कहीं बाहर की हवा न लग जाए, बेड़ियों की खनक में ही जीवन का संगीत ढूँढती रही। पर जब बोध की बिजली गिरी, तो पता चला—पिंजरा खुला था, बस मैं ही उड़ना भूल गई थी। अब पूरा आसमान मेरा है।"

अब चुनाव आपका है: डर में सिमटकर जीना है या बोध की आग में जलकर मुक्त होना है?"

  

  "आपकी राय: क्या आपको भी लगता है कि पिंजरा हमेशा खुला ही था, बस हम ही अपनी 'छवि' को बचाने के डर में उड़ना भूल गए थे? आपके विचार क्या कहते हैं?"

                                                                                                                                        ---- मनीषा 

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