युद्ध की मंडी: हथियारों का उत्सव और लहू की 'करेंसी'
| "जहाँ मासूमों का लहू 'करेंसी' बन जाए और बारूद का धुआँ 'विकास' का सूचक, समझ लीजिये कि वह सभ्यता नहीं, बल्कि 'युद्ध की मंडी' है।" |
शांति का 'सफेद' कत्लखाना
आज की इस तथाकथित 'सुसंस्कृत' और 'सभ्य' दुनिया में शांति की बातें उतनी ही ईमानदारी से की जाती हैं, जितनी ईमानदारी से एक कसाई बकरे की सेहत की दुआ करता है। वैश्विक मंचों पर जब बड़ी-बड़ी महाशक्तियों के प्रतिनिधि सफेद चोगे पहनकर 'शांति के कपोत' (कबूतर) उड़ाते हैं, तो जरा गौर से देखिये—उनकी कोट की जेबों में ताज़ा बारूद की गंध साफ़ महसूस की जा सकती है। यह विकास का वह विद्रूप दौर है जहाँ 'शांति' केवल एक महँगा 'ब्रांड' है, जिसे विज्ञापनों की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि असली मुनाफ़ा तो 'अशांति' के कारखानों में पक रहा है।
विडंबना की पराकाष्ठा तो देखिये, कुछ चतुर राजनेता पहले सुनियोजित तरीके से युद्ध की विभीषिका रचते हैं, मासूमों की बलि चढ़ाते हैं और फिर वही 'शांतिदूत' का मुखौटा पहनकर सुलह कराने का स्वांग रचते हैं। यह 'शांति की दलाली' महज़ इसलिए की जाती है ताकि अंततः वे 'नोबेल शांति पुरस्कार' की कतार में खड़े हो सकें। पहले अपनी ही फैलाई आग में मानवता को झुलसाते हैं और फिर उसी राख पर खड़े होकर अपनी 'अहिंसक छवि' का उत्सव मनाते हैं।
कितनी प्रगतिशील है हमारी यह आधुनिक सभ्यता! पहले हम पत्थरों से मारते थे, अब हम 'जीपीएस' (GPS) लगे हुए सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे बमों से मारते हैं। कम से कम मरने वाले को यह तसल्ली तो रहती है कि उसे मारने वाली मिसाइल 'इको-फ्रेंडली', 'हाई-टेक' और 'अत्याधुनिक' थी।
यह महज़ दो मुल्कों की जंग नहीं है, यह तो उन 'सूट-बूट' वाले सौदागरों का एक वैश्विक उत्सव है, जिनकी तिजोरियों की चाभी निर्दोषों के लहू से सनी हुई है। आज की मंडियों में अनाज महँगा हो या न हो, पर किसी मुल्क को राख करने का सामान बड़े आकर्षक 'डिस्काउंट' पर उपलब्ध है। यहाँ इंसानियत का 'सिक्का' खोटा हो चुका है और 'लहू की करेंसी' ही इस वैश्विक व्यवस्था का असली व्याकरण लिख रही है। जहाँ विनाश को 'इनोवेशन' कहा जाता है और बारूद की निर्बाध बिक्री को 'आर्थिक मजबूती'।
शेयर बाज़ार की 'खूनी हरियाली' और बाज़ारवादी अट्टहास
इस तथाकथित सभ्य और सुसंस्कृत दुनिया के सबसे बड़े 'शक्ति-पीठ'—यानी इनके वैश्विक शेयर बाज़ार—भी बड़े ही विचित्र और क्रूर विरोधाभासों से भरे हुए हैं। यहाँ जब किसी सुदूर बेगुनाह शहर के आसमान से 'स्मार्ट बम' बरसते हैं और मासूमों की चीखें उठती हैं, तो हज़ारों मील दूर 'वॉल स्ट्रीट' और 'दलाल स्ट्रीट' के आलीशान, वातानुकूलित और इत्र से महकते दफ्तरों में एक मधुर, लयबद्ध संगीत सुनाई देने लगता है। किसी माँ की करुण पुकार और उसके उजड़े हुए संसार का विलाप, इन सूट-बूट वाले सभ्य सौदागरों के लिए महज़ एक 'बुल रन' (Bull Run) का शुभ और मांगलिक संकेत होती है। जैसे-जैसे युद्ध की लपटें तेज़ होती हैं, वैसे-वैसे इनकी डिजिटल स्क्रीन्स पर 'प्रॉफिट' का ग्राफ एक शैतानी अट्टहास की तरह ऊपर चढ़ने लगता है।
कितनी अद्भुत, 'प्रगतिशील' और वीभत्स व्यवस्था है यह! यहाँ मानवता जितनी करारी और शर्मनाक हार हारती है, हथियार बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की 'बैलेंस शीट' उतनी ही अधिक 'लहलहाती' और 'हरी-भरी' दिखाई देने लगती है। यह वह दौर है जहाँ किसी एक मुल्क की राख, दूसरे मुल्क की अर्थव्यवस्था के लिए 'संजीवनी' और 'बूस्टर डोज़' का काम करती है। युद्ध के मैदान में जितना अधिक गाढ़ा रक्त बहता है, इन महाशक्तियों के बाज़ारों में 'विकास' (Growth) का पहिया उतना ही चिकना होकर तेज़ी से घूमने लगता है। इनके लिए 'शांति' एक भयावह आर्थिक मंदी है, जबकि 'जंग' एक सुनहरी और कभी न खत्म होने वाली संभावना।
यह दरअसल 'लहू की करेंसी' का वह जादुई और खूनी खेल है, जिसे आम आदमी की समझ से दूर 'रणनीतिक अर्थशास्त्र' के भारी-भरकम शब्दों के पीछे छिपा दिया गया है। जब तक दुनिया के किसी कोने में कोई बम नहीं फटता, तब तक इनके आधुनिक कारखानों की चिमनियों से धुआँ नहीं निकलता और इनके बैंक खातों में मंदी का सन्नाटा पसरने लगता है। इसीलिए, ये 'शांति के छद्म मसीहा' युद्ध को एक मानवीय त्रासदी की तरह नहीं, बल्कि एक 'गोल्डन इन्वेस्टमेंट' (स्वर्ण निवेश) की तरह देखते हैं।
इनके लिए जलते हुए शहर, उजड़ते हुए बचपन और मलबे में तब्दील होती सभ्यताएँ महज़ एक 'आर्थिक आंकड़ा' या 'मार्केट सेंटीमेंट' हैं। विडंबना की पराकाष्ठा देखिये—जहाँ एक ओर कोई पिता अपने बच्चे के शव को मलबे से ढूँढ रहा होता है, वहीं दूसरी ओर ये रईस आढ़ती अपनी चमकदार स्क्रीन्स पर उछलते हुए 'मार्केट कैप' को देखकर शैतानी उल्लास के साथ शैम्पेन की बोतलें खोल रहे होते हैं। यह वह 'आर्थिक तंत्र' है जिसकी बुनियाद ही लाशों के ढेर पर टिकी है, जहाँ 'विकास' की हर ईंट मासूमों की हड्डियों से बनी है।
मीडिया का रण-सर्कस और टीआरपी की खूनी फसल
इस वैश्विक मंडी के प्रचार तंत्र की कमान उन आधुनिक और भव्य न्यूज़ रूम्स के हाथ में है, जो अब 'सूचना के स्रोत' नहीं, बल्कि 'युद्ध के चीयरलीडर' और 'विनाश के उद्घोषक' बन चुके हैं। सभ्यता की इस क्रूर नुमाइश में, मीडिया का चरित्र अब एक ऐसे विदूषक जैसा है जो लाशों के ढेर पर खड़े होकर करतब दिखा रहा है। न्यूज़ स्टूडियो में बैठे वे सूट-बूट वाले एंकर्स, जब बड़ी-बड़ी स्क्रीन्स पर मिसाइलों के प्रक्षेपवक्र (Trajectory) और उनकी मारक क्षमता के ग्राफ़िक्स समझाते हैं, तो उनकी आँखों में वही हिंसक चमक होती है जो किसी सट्टेबाज़ की आँखों में भारी जीत के समय कौंधती है।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिये— जब मिसाइल हवा में उड़ती है, तो स्क्रीन पर ग्राफिक्स ऐसे चमकते हैं जैसे किसी दिवाली का जश्न हो। टीआरपी की इस खूनी फसल को काटने के लिए नैतिकता की बलि देना अब इन सौदागरों के लिए सबसे छोटा और मामूली सौदा रह गया है। किसी शहर पर गिरता हुआ 'स्मार्ट बम' इनके लिए मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि 'प्राइम टाइम' का सबसे आकर्षक विजुअल (दृश्य) होता है। ये न्यूज़ रूम्स अब युद्ध को एक 'वीडियो गेम' की तरह हमारे ड्राइंग रूम में परोस रहे हैं, जहाँ मलबे के नीचे दबी चीखें इनके 'बैकग्राउंड म्यूजिक' के शोर में कहीं दफन हो जाती हैं।
इन न्यूज़ स्टूडियोज़ में 'युद्ध के विशेषज्ञों' की एक पूरी जमात बैठती है, जो मैप पर लकीरें खींचकर ऐसे बताते हैं जैसे किसी रोमांचक क्रिकेट मैच का विश्लेषण हो रहा हो। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि जिन लकीरों को वे मिटा रहे हैं, वे हज़ारों परिवारों के उजड़ने की दास्ताँ हैं। सूचना का यह प्रदूषण इतना गहरा है कि आम आदमी के भीतर की संवेदना को 'एंटरटेनमेंट' (मनोरंजन) के डोज़ से सुन्न कर दिया गया है। जनता अब युद्ध को एक रोमांचक धारावाहिक की तरह देख रही है, जिसकी हर किश्त पर ये चैनल विज्ञापन की महँगी दरें वसूल रहे हैं।
यह वह 'रण-सर्कस' है जहाँ विनाश को 'ग्लेमराइज़' (चमकदार) बनाकर बेचा जा रहा है। कैमरे का लेंस कभी उस माँ की आँखों में झाँकने की हिम्मत नहीं करता जो अपने उजड़े संसार को चुपचाप देख रही है, क्योंकि सन्नाटा टीआरपी नहीं देता; टीआरपी तो धमाकों, आग की लपटों और ग्राफ़िक्स की बाजीगरी से आती है। नैतिकता के इस सामूहिक वध-स्थल पर खड़ा मीडिया, आज उस 'लहू की करेंसी' का सबसे सक्रिय दलाल बन चुका है।
विनाश का प्रयोगशाला और पुनर्निर्माण का 'गिद्ध-भोज'
इस वैश्विक मंडी का एक और वीभत्स चेहरा है—हथियारों का 'लाइव परीक्षण' (Live Trial)। महाशक्तियों के लिए ये युद्ध केवल भू-राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई नहीं, बल्कि उनके नए और घातक खिलौनों की 'प्रयोगशाला' भी हैं। जब दुनिया के किसी कोने में बम गिरते हैं, तो हज़ारों मील दूर बैठे वैज्ञानिक और हथियार निर्माता कंपनियां डेटा इकठ्ठा करती हैं कि उनके 'स्मार्ट वेपन्स' ने इंसानी मांस और कंक्रीट पर कितनी सटीकता से प्रहार किया। यह मानवता का वह विद्रूप चेहरा है जहाँ जीवित बस्तियों को 'टेस्टिंग रेंज' (परीक्षण क्षेत्र) में तब्दील कर दिया गया है। यहाँ मौत महज़ एक 'परफॉरमेंस इंडेक्स' है, जिससे यह तय होता है कि अगली प्रदर्शनी में उस मिसाइल की कीमत क्या होगी।
इस व्यापार की सबसे बड़ी मक्कारी इसके अगले चरण में छिपी है—जिसे ये 'पुनर्निर्माण' (Reconstruction) का नाम देते हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे समझना किसी भी संवेदनशील मस्तिष्क को झकझोर देगा। पहले ये महाशक्तियाँ अपनी मिसाइलों से हँसते-खेलते शहरों को मलबे के ढेर में बदलती हैं, और फिर वही हाथ, जो तबाही का सामान लेकर आए थे, 'मदद' और 'निर्माण' के ठेके लेकर पहुँच जाते हैं। यह एक आधुनिक 'गिद्ध-भोज' है, जहाँ पहले शिकार किया जाता है और फिर उसकी अस्थियों पर मुनाफे की नई इमारतें खड़ी की जाती हैं।
इस 'युद्ध की अर्थव्यवस्था' का पहिया इस तरह घूमता है कि विनाश और निर्माण, दोनों ही स्थितियों में सिक्का महाशक्तियों का ही चलता है। वे देश जो आज खंडहर बन चुके हैं, कल इन्हीं महाशक्तियों के कर्जदार होंगे ताकि वे अपने ही मलबे को साफ कर सकें। कर्ज का यह जाल और हथियारों की यह भूख कभी खत्म नहीं होती, क्योंकि यदि शांति स्थायी हो गई, तो इन सौदागरों के महलों की चमक फीकी पड़ जाएगी।
यहाँ 'मानवीय सहायता' के ट्रक भी अक्सर उन जहाजों के पीछे चलते हैं जिनमें विनाश का सामान लदा होता है। यह उस 'लहू की करेंसी' का वह चक्र है जहाँ इंसानियत को पहले घायल किया जाता है और फिर उसे महँगे 'बैंड-एड' बेचे जाते हैं। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'कॉर्पोरेट वारफेयर' है, जहाँ हर लाश पर एक 'प्राइस टैग' लगा हुआ है और हर कत्लगाह के पीछे एक मल्टीनेशनल कंपनी का बोर्ड टंगा है।
शरणार्थियों की नुमाइश और 'दया' का वैश्विक बाज़ार
इस खूनी मंडी का एक और वीभत्स विस्तार है—मानवीय संवेदनाओं की नीलामी। जब महाशक्तियों के कारखानों में बने बम किसी मुल्क की छतें छीन लेते हैं, तो वहां से उठने वाला विस्थापन का सैलाब इन सौदागरों के लिए 'दया' के व्यापार का नया अवसर लेकर आता है। समुद्र की लहरों पर तैरती मासूमों की लाशें और सरहदों पर कँपकँपाते हुए लाखों शरणार्थी, इन 'सभ्य' मुल्कों के लिए महज़ एक 'फोटोजेनिक' (Photogenic) अवसर बन जाते हैं।
विद्रूपता देखिये, जो हाथ मिसाइलें सप्लाई करते हैं, वही हाथ अब 'शरणार्थी शिविरों' के टेंट और डिब्बाबंद खाना बेचने के ठेके भी हथिया लेते हैं। यहाँ 'मानवता' को पहले बेघर किया जाता है, और फिर उसे 'कैमरों' के सामने रोटी के टुकड़े फेंककर वैश्विक मंचों पर अपनी उदारता का ढोल पीटा जाता है। यह विस्थापन की वह 'मंडी' है जहाँ इंसान की बेबसी को 'फंड रेजिंग' (Fund Raising) के विज्ञापनों में तब्दील कर दिया जाता है। चंदा उन देशों से आता है जो शांति चाहते हैं, और मुनाफ़ा उन कंपनियों की जेब में जाता है जो इन शिविरों में रसद पहुँचाती हैं।
यह दरअसल 'करुणा का प्रहसन' है। सरहदों पर लगी कंटीली तारें केवल मुल्कों को नहीं बाँटतीं, बल्कि यह तय करती हैं कि किस लाश पर दुनिया को रोना है और किस लाश को 'कोलेटरल डैमेज' (Collateral Damage) कहकर भुला देना है। जब तक विस्थापन का यह चक्र चलता रहता है, इन महाशक्तियों के 'एनजीओ' और 'राहत संगठन' फलते-फूलते रहते हैं। यह वह बाज़ार है जहाँ आँसू भी 'लहू की करेंसी' की तरह ही भुनाए जाते हैं।
युद्ध का 'वीडियो-गेम' और संवेदनहीनता का समाजीकरण
इस वैश्विक मंडी का सबसे खतरनाक और अदृश्य आयाम है—मानवीय संवेदनाओं का 'सिस्टमैटिक मर्डर' (Systematic Murder)। महाशक्तियों ने तकनीक और प्रचार के माध्यम से युद्ध को एक ऐसी 'डिजिटल विलासिता' बना दिया है, जिसे हम अपने ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठकर, चाय की चुस्कियों के साथ एक 'वीडियो-गेम' की तरह देखते हैं। जब किसी शहर पर मिसाइल गिरती है और आग का गोला उठता है, तो दर्शक के मन में 'करुणा' नहीं, बल्कि 'रोमांच' (Thrill) पैदा होता है। यह संवेदनहीनता का वह वैश्विक समाजीकरण है, जहाँ हम लाशों के ढेर को महज़ 'पिक्सल' (Pixels) की तरह देखने के आदी हो चुके हैं।
हथियार बनाने वाली कंपनियों और उनके रणनीतिकारों ने युद्ध को 'एंटरटेनमेंट' (मनोरंजन) के साथ इस तरह नत्थी कर दिया है कि आम आदमी के भीतर की 'चीख' अब 'तालियों' में बदल गई है। बच्चों के हाथों में थमाए गए 'वार-गेम्स' से लेकर हॉलीवुड और ग्लोबल मीडिया के 'रण-कौशल' तक, हर जगह युद्ध को एक महान नायकत्व (Heroism) के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सीधा है—इंसान के भीतर के 'साक्षी भाव' और 'प्रतिरोध' को खत्म कर देना, ताकि जब अगली बार 'लहू की करेंसी' के लिए किसी मुल्क की बलि दी जाए, तो दुनिया इसे महज़ एक 'तकनीकी श्रेष्ठता' का प्रदर्शन मानकर चुप रहे।
यह वह मानसिक गुलामी है, जहाँ हम यह भूल चुके हैं कि स्क्रीन पर जो लाल रंग दिख रहा है, वह किसी एनिमेटर की कलाकारी नहीं, बल्कि एक जीवित इंसान का गरम लहू है। जब तक समाज युद्ध को 'तमाशा' समझकर देखता रहेगा, इन महाशक्तियों की 'मंडी' में रौनक कभी कम नहीं होगी। संवेदनाओं का यह अकाल ही इस खूनी व्यापार की सबसे बड़ी सफलता है।
वैश्विक पाखंड और 'शांति' की दलाली
सभ्यता के इस क्रूर तमाशे का सबसे वीभत्स अध्याय वह है जिसे दुनिया 'शांति स्थापना' का नाम देती है। इतिहास गवाह है कि इस वैश्विक मंडी के सबसे बड़े 'शिकारी' ही अक्सर 'मसीहा' का चोगा पहनकर मंचों पर अवतरित होते हैं। यह पाखंड की वह पराकाष्ठा है जहाँ कुछ चतुर राजनेता पहले सुनियोजित तरीके से युद्ध की विभीषिका रचते हैं, मासूमों की बलि चढ़ाते हैं और फिर वही 'शांतिदूत' का मुखौटा पहनकर सुलह कराने का स्वांग रचते हैं। उनकी आँखों में मानवता के लिए आँसू नहीं, बल्कि 'नोबेल शांति पुरस्कार' की चमक होती है। पहले अपनी ही फैलाई आग में दुनिया को झुलसाते हैं और फिर उसी राख पर खड़े होकर अपनी 'अहिंसक छवि' का व्यापार करते हैं। शिकारी जब खुद को 'मसीहा' घोषित कर दे, तो समझ लेना चाहिए कि अब दुनिया में कोई जंगल सुरक्षित नहीं है।
दुनिया के सबसे बड़े 'शांति पुरस्कार' अक्सर उन हाथों में सजे हैं जिनकी उँगलियाँ कभी 'ट्रिगर' पर थीं। यह उस विद्रूपता का शिखर है जहाँ शिकारी ही हिरण की शोक-सभा में मुख्य अतिथि बनता है। यह 'लहू की करेंसी' का वह अंतिम हिसाब है, जहाँ हत्यारों को सम्मानित किया जाता है और मारे गए लोग महज़ एक 'कोलेटरल डैमेज' की धूल भरी फाइल में दफन हो जाते हैं। जब तक 'शांति' का अर्थ इन सौदागरों के लिए महज़ एक 'व्यापारिक विराम' रहेगा, तब तक युद्ध की यह मंडी इसी तरह सजती रहेगी।
'आत्मबोध' के पथ पर चलते हुए हमें यह समझना होगा कि यह विनाशकारी 'मंडी' दरअसल हमारी सामूहिक चेतना की गिरावट का ही प्रतिबिंब है। जब तक मनुष्य 'देह' के अहंकार और भौतिक लालसाओं की इस मंडी में स्वयं को बेचता रहेगा, तब तक बाहर के ये युद्ध कभी शांत नहीं होंगे। 'आत्मबोध' का मार्ग केवल हिमालय की कंदराओं या एकांत के ध्यान से होकर नहीं गुज़रता; वह इस वर्तमान के 'रण-सर्कस' की आँखों में आँखें डालकर सत्य को पहचानने से शुरू होता है। वास्तविक 'चैतन्य' होना वही है, जो अपनी सुख-सुविधाओं के बीच बैठा हुआ भी सरहदों पर बहते लहू और सत्ता के पाखंड को देख सके और उसे नकार सके।
यही जागरूकता हमारी सबसे बड़ी तपस्या है। 'देह से चेतना की ओर' जाने का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम अपनी आँखें मूंद लें, बल्कि इसका अर्थ है कि हम अपनी चेतना की मशाल इतनी प्रज्वलित कर लें कि बाज़ार के ये अंधेरे और 'लहू की करेंसी' हमें भ्रमित न कर सकें। जागरूक रहना ही जीवित रहना है, और भीतर की उस मंडी को उजाड़ना ही असली 'आत्मबोध' है, जहाँ हम अपनी आत्मा का सौदा हर रोज़ किश्तों में करते हैं।
"जब अगली बार आप अपनी स्क्रीन पर किसी शहर को मलबे में तब्दील होते और मिसाइलों को दिवाली के जश्न की तरह चमकते देखें, तो खुद से बस एक सवाल पूछिएगा—क्या आप एक जागरूक इंसान के रूप में उस त्रासदी को देख रहे हैं, या आप भी इस 'रण-सर्कस' के एक मूक और संवेदनहीन खरीदार बन चुके हैं? आपकी चुप्पी इस 'लहू की मंडी' का हिस्सा है या इसके खिलाफ एक विद्रोह?"
---- मनीषा
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