मुखौटों का ड्राई-क्लीनर
मुखौटों का ड्राई-क्लीनर प्रस्तावना: हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ दाग कपड़ों पर नहीं, चरित्र पर हैं। लेकिन विडंबना देखिए, हम चरित्र सुधारने के बजाय उन मुखौटों को चमकाने में व्यस्त हैं जिन्हें पहनकर हम दुनिया के सामने जाते हैं। यह कविता समाज के उसी चमकते हुए पाखंड की एक कड़वी हकीकत है। शहर के पॉश इलाके की एक चमचमाती दुकान, जहाँ कपड़ों के दाग नहीं, 'किरदार' के धब्बे धोए जाते हैं। बाहर कांच पर लिखा है— "यहाँ हर तरह के पाप रफ़ू किए जाते हैं।" भीड़ में वह आदमी सबसे आगे है, जिसने कल ही एक मासूम का हक डकारा है, वह अपनी 'परोपकारी' मुस्कान को प्रेस करवाने आया है, ताकि शाम की पार्टी में वह 'त्याग' जैसा कड़क दिख सके। एक प्रेमी अपनी सड़ी हुई नीयत लाया है, "भाई साहब, इस पर थोड़ा 'इश्क' का परफ्यूम छिड़क दो, इसकी बदबू अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं होती।" कोने में एक बुद्धिजीवी अपनी 'कलम' धो रहा है, जिसकी स्याही अब सत्ता के तलवों जैसी काली हो चुकी है, वह उसे 'तटस्थता' के ब्लीच में भिगोता है, ताक...