प्रस्तावना: हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ दाग कपड़ों पर नहीं, चरित्र पर हैं। लेकिन विडंबना देखिए, हम चरित्र सुधारने के बजाय उन मुखौटों को चमकाने में व्यस्त हैं जिन्हें पहनकर हम दुनिया के सामने जाते हैं। यह कविता समाज के उसी चमकते हुए पाखंड की एक कड़वी हकीकत है।
शहर के पॉश इलाके की एक चमचमाती दुकान,
जहाँ कपड़ों के दाग नहीं, 'किरदार' के धब्बे धोए जाते हैं।
बाहर कांच पर लिखा है—
"यहाँ हर तरह के पाप रफ़ू किए जाते हैं।"
भीड़ में वह आदमी सबसे आगे है,
जिसने कल ही एक मासूम का हक डकारा है,
वह अपनी 'परोपकारी' मुस्कान को प्रेस करवाने आया है,
ताकि शाम की पार्टी में वह 'त्याग' जैसा कड़क दिख सके।
एक प्रेमी अपनी सड़ी हुई नीयत लाया है,
"भाई साहब, इस पर थोड़ा 'इश्क' का परफ्यूम छिड़क दो,
इसकी बदबू अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं होती।"
कोने में एक बुद्धिजीवी अपनी 'कलम' धो रहा है,
जिसकी स्याही अब सत्ता के तलवों जैसी काली हो चुकी है,
वह उसे 'तटस्थता' के ब्लीच में भिगोता है,
ताकि सफेद पन्नों पर वह 'क्रांति' जैसा भ्रम पैदा कर सके।
ड्राई-क्लीनर कड़वी हंसी हँसता है और कहता है—
"मूर्खों! तुम जो ये सफेदी ढो रहे हो,
ये उजाला नहीं, रूह पर जमी हुई राख है।
मैं तुम्हारे मुखौटों की सिलवटें तो मिटा दूँगा,
पर उस चेहरे का क्या करोगे जो आईने में तुम्हें ही काट खाने को दौड़ता है?"
मैं भी खड़ा था उसी लाइन में,
अपनी उस 'शर्म' को चमकाने,
जिसने अब पानी माँगना भी छोड़ दिया था।
ड्राई-क्लीनर ने मेरा टोकन वापस कर दिया और बोला—
"तेरा इलाज यहाँ नहीं है दोस्त,
यहाँ सिर्फ 'बेशर्मी' की सर्विस होती है,
मरे हुए ज़मीर को ज़िंदा करने का केमिकल अभी बना ही नहीं।"
मेरी कलम से...
अक्सर भीड़ में चलते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं इंसानों से नहीं, चलते-फिरते मुखौटों से मिल रही हूँ। हम अपनी बुराइयों को छोड़ने के बजाय उन्हें सलीके से ढकने की कला में माहिर हो चुके हैं। यह कविता उस 'अंतिम सच' की तलाश है, जहाँ इंसान अपने असली चेहरे से भागना बंद कर दे।
"आत्मबोध की ओर एक कदम:"
अक्सर हम दुनिया को साफ़ दिखने की कोशिश में इतने मगन हो जाते हैं कि अपने भीतर की कालिख को भूल जाते हैं। 'आत्मबोध' की पहली सीढ़ी ही यही है कि हम उन मुखौटों को उतार फेंकें जिन्हें हमने समाज के लिए पहना है। जब तक हम 'सफेदी' बाहर ढूँढते रहेंगे, दाग बढ़ते रहेंगे; जिस दिन सच का सामना करने का साहस भीतर से जगेगा, उसी दिन असली आत्मबोध होगा।
— मनीषा
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