डिजिटल उपवास: २१वीं सदी का सबसे बड़ा आत्म-विद्रोह
डिजिटल शोर के अनंत पिंजरे में, 'मौन' का एक छोटा सा दीया ही आपकी 'चेतना' को आज़ाद कर सकता है।" डिजिटल उपवास: २१वीं सदी का सबसे बड़ा आत्म-विद्रोह मानव इतिहास की यात्रा को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए, तो 'मौन' और 'एकांत' को हमेशा सत्य की खोज का आधार माना गया है। प्राचीन ऋषियों के तपोवन से लेकर आधुनिक दार्शनिकों के एकांत अध्ययन कक्षों तक, सभी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'स्वयं' को जानने के लिए संसार के कोलाहल से कटना अनिवार्य है। किंतु २१वीं सदी के तीसरे दशक में हम एक ऐसी सभ्यता के रूप में उभरे हैं जो 'मौन' से थर-थर कांपती है। आज का मनुष्य अकेले होने से नहीं डरता, वह उस 'शून्य' (Void) से डरता है जो स्मार्टफोन की स्क्रीन बंद होते ही उसके सामने नग्न होकर खड़ा हो जाता है। हमने अपने अस्तित्व के सन्नाटे को सूचनाओं के निरंतर प्रवाह, विज्ञापनों की कृत्रिम चमक और डिजिटल कचरे से इतना अधिक भर लिया है कि अब हमें स्वयं की मौलिक आवाज़ भी सुनाई नहीं देती। स्मार्टफोन अब केवल एक यंत्र या 'टूल' नहीं रहा, वह मनुष्य के शरीर का एक 'अदृश्य अ...