इंसानियत का इश्तहार

 

     "इंसानियत का इश्तहार"

                     (एक गहरा मानवीय व्यंग्य)

 

तुम कहते हो तुम जाग रहे हो?

पर ये नींद तो बहुत गहरी है!

यहाँ सच की जुबान कटी हुई,

और न्याय की अदालत बहरी है।

तुमने ओढ़ रखी है जो शराफत,

वो बस एक 'सस्ते रेशम' की चादर है,

अंदर तो वही पुराना जंगल है,

वही कत्लगाह, वही खौफनाक मंजर है।

अरे! लज्जा आती है?

संस्कारों की दुकान सजाकर बैठे हो,

पर भीतर तो नफरत का सामान रखे हो!

तुम पूजते हो पत्थर को बड़ी शिद्दत से,

मगर ज़िंदा इंसान को पैरों तले रखे हो।

ये कैसी तुम्हारी 'सभ्यता' की चमक है?

जिसमें सिर्फ झूठ और दिखावे की खनक है।

सुनो! अब मुखौटे उतार दो,

क्योंकि मौत किसी का चेहरा नहीं देखती,

वो ऊँची हवेलियों का पहरा नहीं देखती।

जिस दिन ये 'अहंकार' का महल ढहेगा,

तब न ये जिस्म, न ये लिबास बचेगा,

बस वही 'सत्य' का एक कतरा बचेगा,

जिसे तुमने ताउम्र गुमराह किया था,

जिसे तुमने इस 'भीड़' में तबाह किया था। 

                                                              ---  मनीषा

"दिखावों के इस बाज़ार में, हमने अपनी असलियत को कितनी परतों के नीचे दफन कर रखा है? जिस दिन ये मुखौटे उतरेंगे, क्या आप अपने उस 'सत्य' का सामना कर पाएंगे?

अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताएं।" 

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