मुखौटों का महोत्सव : क्या हम वास्तव में वही हैं जो दिखाते हैं? (The Festival of Masks)


"भीतर भरा है कोलाहल, और बाहर ओढ़ी है गहराई।"

​आज के इस दौर में हम सब एक ऐसी दौड़ का हिस्सा हैं जहाँ चेहरा असली नहीं, बल्कि वह है जो दुनिया देखना चाहती है। हम शब्दों से तो ब्रह्म की बात करते हैं, पर हमारे आचरण में छल समाया है। यह कविता उस कड़वे सच का आईना जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।


मुखौटों का महोत्सव

अट्टहास करता है समय, देख मनुज की ये चतुराई,

भीतर भरा है कोलाहल, और बाहर ओढ़ी है गहराई।

तुम शब्द-ब्रह्म की बात करो, पर अर्थों में विष घोल रहे,

मर्यादा की जो ओट लिए, वो नीचता अपनी तौल रहे।

ये कैसा अद्भुत दर्शन है, जो केवल 'पर्दे' पर जीवित है?

सत्य यहाँ असहाय खड़ा, और मिथ्या यहाँ सुशोभित है।

तुम ज्ञान बाँटते फिरते हो, पर स्वयं बोध से कोसों दूर,

अहंकार के इस मदिरालय में, हर प्याला मद में है चूर।

जो कल तक मौन साधते थे, आज वे ऊँचा चिल्लाते हैं,

कागज़ के चंद फूलों में, वे असली महक बताते हैं।

तुम भीड़ ढूँढते फिरते हो, पर एकांत से डरते हो,

जीते जी मरते हो पल-पल, और मरने पर आहें भरते हो।

हे राही! रुक कर देख जरा, इस दौड़ का अंत कहाँ होगा?

जब आत्मा ही गिरवी रख दी, तो फिर तेरा 'स्व' कहाँ होगा?

मुखौटे उतारो, सत्य चुनो, चाहे वो कड़वा प्याला हो,

वरना ये जीवन व्यंग्य बनेगा, चाहे कितना भी उजियाला हो!

                                                                                                            --- मनीषा

आत्म-चिंतन (Final Thoughts)

         क्या हम वास्तव में वही हैं जो हम दुनिया को दिखा रहे हैं? या हमने भी समाज के डर से या अपनी छवि को बचाने के लिए कोई मुखौटा पहन रखा है? जब तक हम अपने सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक 'देह से चेतना' का यह सफर अधूरा ही रहेगा।
        क्या आपने भी कभी महसूस किया है कि आप अपनी असलियत छिपा रहे हैं? अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें।

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