'त्रिनेत्रधारी: सतीश्वर का हुंकार'

Trinetradhari Shiv

"सृष्टि का आरंभ भी 'ॐ' है और उसका अंत भी 'अतुल्य मौन'। शिव केवल एक नाम नहीं, बल्कि उस अजेय शक्ति का हुंकार है जो हमारे भीतर के अंधकार को भस्म कर सत्य का प्रकाश फैलाती है। प्रस्तुत कविता महादेव के उसी विराट स्वरूप को समर्पित एक भावपूर्ण वंदना है।"

त्रिनेत्रधारी: सतीश्वर का हुंकार

वह व्योम-केश, वह सर्व-वेश, वह काल-जयी अविनाशी है,
वह भस्म-अंग, वह गंग-संग, वह अगम-अगोचर वासी है।

जिसके डमरू की डम-डम से, यह सकल चराचर काँप रहा,
वह महाकाल, वह विकट-व्याल, जो युग का अंतर नाप रहा।

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वह त्रिशूल-धारी, त्रिपुर-अरि, वह तीन लोक का स्वामी है,
वह शून्य-रूप, वह भव्य-भूप, वह अंतस-अन्तर्यामी है।

वह व्याघ्र-चर्म, वह भस्म-नर्म, वह मुण्ड-माल गल धारी है,
वह आदि-अंत, वह योग-संत, वह त्रिगुण-तीत अविकारी है।

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जब खुले तीसरा नयन प्रखर, तब काम-देव जल जाता है,
जब चढ़े चाप पर प्रत्यंचा, तब काल स्वयं थर्राता है।

वह शम्भु, सदाशिव, औघड़-दानी, अघोर-पंथ का मान प्रिये,
वह कंठ-विषप, वह सृष्टि-शिल्प, वह मानवता का गान प्रिये।

जो जटा-जूट में गंग धार, जग के संताप मिटाता है,
वही रुद्र, वही मंगलकारी, शिव-सत्य-शुभम् कहलाता है।

मेरी कलम से...

"शिव कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वह परम शून्य है जिससे ब्रह्मांड उपजा है और जिसमें अंततः सब विलीन हो जाना है। अक्सर हम शिव को केवल संहारक के रूप में देखते हैं, लेकिन मेरे लिए शिव उस 'आत्मबोध' का प्रतीक हैं जो हमें हमारे अहंकार और अज्ञानता से मुक्त करते हैं। 'सतीश्वर का हुंकार' मेरे भीतर के उसी अद्वैत भाव की अभिव्यक्ति है, जहाँ देह का अस्तित्व समाप्त होता है और चेतना जागृत होती है। यह रचना मात्र शब्द नहीं, बल्कि मेरी आध्यात्मिक यात्रा का एक पड़ाव है।"

संवाद: साथियों, महादेव का कौन सा स्वरूप आपको सबसे अधिक प्रेरित करता है? क्या आपने कभी अपने भीतर उस 'हुंकार' को महसूस किया है जो सत्य के लिए खड़ी होती है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार साझा करें।
✍️ मनीषा

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