डिग्रियों का कब्रिस्तान और बेरोज़गारी का जश्न

कब्रों के बीच बैठा हताश युवा और डिग्रियों का सन्नाटा - सामाजिक लेख
"क्या ये डिग्रियां हमारी पहचान थीं या हमारी मेधा का 'मृत्यु-पत्र'?"

कार्यशील जनसंख्या' का छलावा — एक वैचारिक विमर्श

किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी युवा ऊर्जा को 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहना कागजों पर जितना सुखद और गौरवशाली लगता है, धरातल पर उसकी हकीकत उतनी ही डरावनी और खोखली है। जिसे गर्व से दुनिया का सबसे जवान समाज कहा जाता है, वास्तव में वह जवानी एक बहुत बड़े और सुनियोजित 'छलावे' की भेंट चढ़ रही है।

अर्थशास्त्र की भाषा में 20 से 35 साल की वह उम्र मनुष्य की 'पीक प्रोडक्टिविटी' यानी सबसे कार्यशील और रचनात्मक समय होता है, जिसमें एक मस्तिष्क नए आविष्कार कर सकता था या वैश्विक उद्योगों की नींव रख सकता था। लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि राष्ट्र की यह सबसे बड़ी पूंजी 'उत्पादन' के बजाय 'प्रतीक्षा' की भेंट चढ़ रही है।

धूल भरी गलियों से लेकर महानगरों के सीलन भरे कमरों तक, एक पूरी पीढ़ी अपनी उत्पादकता को रद्दी की तरह ओएमआर शीट्स के काले घेरों में जला रही है। यह महज़ बेरोज़गारी का आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की रचनात्मकता का 'सामूहिक नरसंहार' है, जहाँ सबसे ऊर्जावान हाथ केवल 'प्रार्थी' और 'याचक' बनने की अंतहीन कतार में खड़े कर दिए गए हैं।

इस छलावे की सबसे गहरी जड़ उस मनोवैज्ञानिक 'सुरक्षा' के मोह में है, जिसे समाज ने सफलता का एकमात्र पैमाना घोषित कर दिया है। यह सुरक्षा का भ्रम वास्तव में राष्ट्रीय मेधा का वह दमन है, जहाँ एक डॉक्टर, इंजीनियर या उच्च शिक्षित शोधकर्ता—जिसमें दुनिया बदलने की कुवत थी—वह महज़ एक क्लर्क या चपरासी बनने के लिए नदियों के नाम और इतिहास की रद्दी तारीखें रट रहा है।

यह डिग्रियों का वह कब्रिस्तान है जहाँ हर साल लाखों नवाचारी विचार बिना जन्म लिए ही दफन हो जाते हैं। जब एक मेधावी मस्तिष्क अपना स्वर्ण-काल केवल सामान्य ज्ञान के रट्टे मारने में खर्च करता है, तो वह केवल एक नौकरी नहीं खोज रहा होता, बल्कि वह अपनी मौलिक चेतना की हत्या कर रहा होता है।

व्यवस्था ने इस भेड़चाल को 'प्रतियोगिता' का नाम दिया है, जबकि हकीकत में यह चयन की प्रक्रिया नहीं बल्कि 'भीड़ को बाहर करने' का एक क्रूर खेल है। इस खेल का गणित इतना भयावह है कि यहाँ मात्र एक प्रतिशत लोग ही सफल हो पाते हैं, जबकि शेष निन्यानबे प्रतिशत युवा अपनी जवानी के दस साल और अपना आत्मविश्वास गंवाकर एक मानसिक रूप से पराजित समाज का हिस्सा बन जाते हैं। उन एक प्रतिशत की सफलता का जश्न मनाकर व्यवस्था शेष निन्यानबे प्रतिशत की ऊर्जा की बर्बादी पर पर्दा डाल देती है।

इस तंत्र ने युवाओं के मन में एक गहरा 'सेल्फ-गिल्ट' यानी आत्म-ग्लानि का बीज बो दिया है, जिससे वे यह मानने लगते हैं कि उनकी असफलता का कारण उनकी अपनी 'मेहनत की कमी' है, न कि सड़ा हुआ सिस्टम। नीति-निर्माता इस 'इंतज़ार' के मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं; वे जानते हैं कि यदि युवा को विज्ञापन, पेपर लीक और न्यायालयों की अंतहीन सुरंग में फंसाए रखा जाए, तो उसकी क्रांतिकारी ऊर्जा हताशा में बदल जाएगी।

थका हुआ युवा कभी सवाल नहीं पूछता, वह बस अगले प्रवेश-पत्र की 'खैरात' का इंतज़ार करता है। इसी इंतज़ार के बीच वह 40 की उम्र के उस सन्नाटे में पहुँच जाता है, जहाँ उसके पास न तो जोखिम लेने की शक्ति बचती है और न ही वह उत्पादकता। अंततः, वह जीवन यापन के लिए किसी छोटे-मोटे काम में खुद को झोंक देता है, जहाँ से राष्ट्र को कोई दूरगामी लाभ नहीं मिलता।

यह 'बेरोज़गारी का जश्न' उन कोचिंग संस्थानों और अवसरवादी राजनीतिज्ञों के लिए है जो इस भीड़ की बेबसी को अपना व्यापारिक और चुनावी ईंधन बनाते हैं। जब तक शिक्षा केवल 'पेट भरने' का माध्यम रहेगी और रट्टा मारना ही योग्यता की कसौटी होगा, तब तक हमारी डिग्रियाँ उस मेधा की शोक-पटिका ही बनी रहेंगी जो कभी महान आविष्कारक बन सकती थी।



प्रशासनिक चक्रव्यूह — मेधा की जड़ता और फाइलों का बोझ

सरकारी सेवा में चयन के बाद एक युवा जिस उत्साह और संकल्प के साथ कदम रखता है, वह अक्सर व्यवस्था की पहली ही दहलीज पर दम तोड़ देता है। राष्ट्र-निर्माण का जो सपना उसने अपनी आँखों में सजाया होता है, वह धीरे-धीरे 'डाटा एंट्री' और 'अनंत सूचियों' के नीरस अंबार में विलीन हो जाता है। यह प्रशासनिक तंत्र का वह चक्रव्यूह है जहाँ ऊँची डिग्रियाँ और तीक्ष्ण मेधा केवल औपचारिकताओं की भेंट चढ़ा दी जाती हैं।

विडंबना देखिए कि जिस अधिकारी या कर्मचारी को अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग नीतिगत सुधारों और विकास कार्यों में करना चाहिए था, उसे व्यवस्था ने महज़ एक 'डाटा ऑपरेटर' बनाकर छोड़ दिया है। आज सरकारी अमले का एक बड़ा हिस्सा केवल इस जोड़-तोड़ में लगा है कि किसका नाम किस सूची में जोड़ना है और किसका काटना है। यह किसी मेधावी मस्तिष्क का उपयोग नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा का 'नियोजित क्षरण' है।

प्रशासनिक दक्षता का दावा करने वाली सरकारें वास्तव में अपने सबसे कीमती मानव संसाधन को 'बाबूगीरी' के उस दलदल में धकेल देती हैं जहाँ से कोई नया विचार बाहर नहीं निकल पाता। एक डॉक्टर या इंजीनियर जब सरकारी तंत्र का हिस्सा बनता है, तो वह अस्पताल या लैब में समय बिताने के बजाय 'राशन कार्ड' की यूनिटें गिनने और 'किसान सम्मान निधि' के आंकड़ों को सुधारने में अपनी जवानी खपा देता है।

यह केवल एक कर्मचारी की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र का नुकसान है। जब हम एक प्रशिक्षित मस्तिष्क को ऐसे कामों में उलझा देते हैं जिनका कोई दूरगामी सकारात्मक परिणाम नहीं निकलता, तो हम वास्तव में देश के विकास की गति को धीमा कर रहे होते हैं। यह व्यवस्था केवल 'आज' को मैनेज करने में लगी है, 'कल' को बनाने का इसके पास न तो समय है और न ही इच्छाशक्ति।

सबसे घातक पहलू वह है जिसे 'प्रशासनिक व्यस्तता' का नाम दिया जाता है। चुनाव से लेकर जनगणना तक, और मुफ्तखोरी की योजनाओं के वितरण से लेकर आईडी कार्ड बनवाने तक—सरकारी कर्मचारी को हर उस काम में झोंक दिया जाता है जो राजनीतिक लाभ तो दिला सकता है, लेकिन समाज में वास्तविक 'कौशल' या 'स्वास्थ्य' के स्तर को ऊँचा नहीं उठाता।

अधिकारी और कर्मचारी आज केवल सत्ता के 'चुनावी एजेंट' बनकर रह गए हैं। वे केवल उन योजनाओं के क्रियान्वयन में अपनी पूरी मेधा खर्च कर देते हैं जिनका उद्देश्य जनता को 'शिक्षित' करना नहीं, बल्कि उन्हें 'आश्रित' बनाए रखना है। इस प्रक्रिया में वह अधिकारी खुद को एक ऐसे मशीन के पुर्जे जैसा महसूस करने लगता है, जिसका काम केवल कमांड का पालन करना है, सोचना नहीं।

जब तक हमारी प्रशासनिक संरचना मेधावी हाथों को 'नवाचार' और 'निर्णय लेने' की स्वतंत्रता नहीं देगी, तब तक यह चक्रव्यूह ऐसे ही बना रहेगा। हम केवल फाइलों का ढेर बढ़ाते रहेंगे, जबकि राष्ट्र की वास्तविक समस्याओं का समाधान उन फाइलों के नीचे दबा सिसकता रहेगा। यह अध्याय हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में सेवा कर रहे हैं, या हम केवल एक जड़ तंत्र के गुलाम बने हुए हैं।




 राजनीतिक गिद्ध — मुफ्तखोरी और चुनावी सम्मोहन का खेल

राजनीति का सबसे क्रूर चेहरा वह है, जहाँ जनता को 'नागरिक' से 'याचक' में बदल दिया जाता है। जिसे हम कल्याणकारी राज्य की योजनाएं कहते हैं, वास्तव में वे अक्सर वोटों की अग्रिम बुकिंग के 'चुनावी झुनझुने' होते हैं। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक खेल है, जहाँ सत्ता जनता को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उसे 'खैरात' पर आश्रित रहने का आदी बना देती है।

आज की राजनीति ने 'विकास' की परिभाषा को संकुचित कर दिया है। अब विकास का अर्थ नए उद्योग लगाना, अनुसंधान पर खर्च करना या बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देना नहीं रह गया है। अब विकास का अर्थ है—कितने हज़ार करोड़ की 'रेवड़ियाँ' बांटी गईं और कितने लोगों को मुफ्त के राशन की कतार में खड़ा किया गया। यह राष्ट्र की उन्नति नहीं, बल्कि उसकी 'बौद्धिक दरिद्रता' का विज्ञापन है।

विडंबना देखिए कि जिस हाथ में हुनर और औज़ार होने चाहिए थे, उस हाथ को व्यवस्था ने 'राशन का थैला' पकड़ा दिया है। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और खातों में आने वाली दो-दो हज़ार की किश्तें वास्तव में वह 'धीमा ज़हर' हैं, जो एक स्वाभिमानी युवा की मेहनत करने की इच्छाशक्ति को कुंद कर देती हैं। जब पेट बिना कुछ किए भरने लगे, तो मस्तिष्क सवाल पूछना बंद कर देता है।

यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति अपना 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' जीतती है। एक शिक्षित और हुनरमंद युवा सवाल पूछेगा—अस्पताल कहाँ हैं? स्कूल की गुणवत्ता क्या है? नए उद्योग क्यों नहीं लग रहे? लेकिन एक 'आश्रित' व्यक्ति केवल अपनी अगली किश्त का इंतज़ार करेगा। सत्ता को 'नागरिक' नहीं, 'वोटर' चाहिए, और वोटर को सम्मोहित रखने के लिए मुफ्तखोरी से बड़ा कोई हथियार नहीं है।

इस पूरे खेल में सरकारी तंत्र को केवल एक 'वितरण मशीन' बना दिया गया है। देश का सबसे मेधावी प्रशासनिक अमला आज इसी जोड़-तोड़ में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रहा है कि किसे मुफ्त का लाभ देना है और किसका नाम काटना है। प्रशासनिक अधिकारियों का उपयोग राष्ट्र-निर्माण के 'आर्किटेक्ट' के रूप में होना चाहिए था, लेकिन उन्हें केवल 'चुनावी एजेंट' बनाकर रख दिया गया है।

शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढांचों पर निवेश करने के बजाय, संसाधनों को ऐसी योजनाओं में फूँका जा रहा है जिनका कोई दूरगामी सकारात्मक परिणाम नहीं निकलता। यह 'गड्ढा खोदकर उसे भरने' जैसा काम है। हम वर्तमान की सत्ता बचाने के लिए भविष्य की पीढ़ियों का संसाधन खर्च कर रहे हैं। यह राष्ट्र के साथ एक ऐसा विश्वासघात है, जिसका हर्जाना आने वाली पीढ़ियों को अपनी पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था से चुकाना होगा।

जब तक जनता इस 'मुफ्तखोरी' के पीछे छिपे राजनीतिक एजेंडे को नहीं समझेगी, तब तक हम एक 'पंगु' समाज बने रहेंगे। आत्मबोध की कमी ही वह कारण है जिससे हम अपनी गरिमा को दो हज़ार की किश्त के बदले बेच देते हैं। हमें यह समझना होगा कि जो हाथ आज मुफ्त का अनाज दे रहा है, उसी ने कल हमारे बच्चों के स्कूल और हमारे युवाओं के रोज़गार के अवसर छीन लिए हैं।



 नवाचार का अकाल — रट्टा मारो और क्लर्क बनो संस्कृति

हमारी शिक्षा प्रणाली और सफलता के पैमानों ने एक ऐसी 'बौद्धिक भट्टी' तैयार कर दी है, जहाँ मौलिक विचारों को जलाकर केवल 'सूचनाओं का रट्टा' मारने वाले रोबोट तैयार किए जा रहे हैं। विडंबना यह है कि जिसे हम 'प्रतिभा' कहते हैं, वह अक्सर केवल याददाश्त का एक खेल है। रात-रात भर जागकर तथ्यों को रटना और परीक्षा के पन्नों पर उन्हें उगल देना—क्या यही एक विकसित राष्ट्र की नींव है?

आज का युवा अपनी रचनात्मक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उन सूचनाओं को संकलित करने में लगा रहा है, जिनका उसके वास्तविक जीवन या राष्ट्र के विकास से कोई सीधा संबंध नहीं है। एक इंजीनियर जो मशीनें बना सकता था, वह महज़ एक परीक्षा पास करने के लिए इतिहास की मृत तारीखें रट रहा है। यह मेधा का उपयोग नहीं, बल्कि मेधा का 'अपव्यय' है। जब श्रेष्ठ मस्तिष्क 'नवाचार' (Innovation) के बजाय 'लिपिकीय कार्यों' (Clerical Jobs) की ओर भागता है, तो समाज का बौद्धिक स्तर गिरना निश्चित है।

नवाचार और अनुसंधान (Research) के लिए जिस 'जोखिम' और 'स्वतंत्र सोच' की आवश्यकता होती है, उसे हमारे समाज ने 'सुरक्षा' के नाम पर कुचल दिया है। सरकारी नौकरी को सफलता का चरम मानना वास्तव में एक 'मानसिक पिंजरा' है। जहाँ नया सोचने की मनाही हो और केवल पुराने ढर्रे पर फाइलों को आगे बढ़ाना ही उपलब्धि हो, वहाँ कोई नया आविष्कार कैसे जन्म ले सकता है? हम 'जुगाड़' को तो जानते हैं, लेकिन 'आविष्कार' की संस्कृति से कोसों दूर हैं।

विश्व के विकसित देशों में जहाँ युवा अपनी ऊर्जा नए स्टार्टअप्स, पेटेंट्स और वैज्ञानिक खोजों में लगा रहे हैं, हमारे यहाँ का सबसे मेधावी वर्ग 'प्रशासनिक बाबू' बनने की होड़ में शामिल है। यह केवल एक करियर का चुनाव नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की उस 'सोचने वाली शक्ति' का अंत है जो देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकती थी। हमने 'नौकरशाहों' की फौज तो खड़ी कर ली है, लेकिन 'विचारकों' और 'निर्माताओं' का अकाल पैदा कर दिया है।

सरकारें भी अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च करने के बजाय, लोक-लुभावन योजनाओं में बजट खपाना बेहतर समझती हैं। जब प्रयोगशालाओं में धूल जम रही हो और पुस्तकालयों में सन्नाटा हो, तो राष्ट्र केवल 'उपभोक्ता' बना रह सकता है, 'विश्व-नेता' नहीं। हम दूसरों की तकनीक खरीदने वाले समाज बनकर रह गए हैं, क्योंकि हमने अपने युवाओं को 'प्रश्न पूछना' नहीं, बल्कि 'उत्तर रटना' सिखाया है।

एक क्लर्क या बाबू के रूप में रिटायर हो जाना किसी व्यक्ति के लिए सुरक्षित जीवन हो सकता है, लेकिन एक सभ्य समाज के रूप में यह हमारी सामूहिक हार है। हमने लाखों संभावित 'कलाम' और 'रामानुजन' को सरकारी दफ्तरों की फाइलों के नीचे दबा दिया है। जब तक सफलता का पैमाना 'नया सृजन' (Creation) न होकर 'सरकारी ठप्पा' रहेगा, तब तक हमारी डिग्रियाँ केवल कागज़ के वो टुकड़े रहेंगी जिनका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है।

हमें एक ऐसी क्रांति की आवश्यकता है जहाँ 'सीखने' का अर्थ 'रटना' न हो, बल्कि 'समझना' और 'बदलना' हो। जब तक हमारी मेधा केवल 'सेवा' (Service) की तलाश में रहेगी और 'नेतृत्व' (Innovation) से डरेगी, तब तक हम दुनिया के पीछे ही चलते रहेंगे। यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र मशीनों से नहीं, बल्कि उन मस्तिष्कों से बनता है जो लीक से हटकर सोचने का साहस रखते हैं।




 मनोवैज्ञानिक युद्ध — युवा चेतना की घेराबंदी और भटकाव

सत्ता और नीति-निर्माता इस सत्य को भली-भांति जानते हैं कि युवा ऊर्जा एक प्रखर ज्वाला की तरह होती है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा, सार्थक रोज़गार और सृजन के अवसर न मिले, तो यह व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का स्वर बन सकती है। इसलिए, इस ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए लाठियों से अधिक 'मनोवैज्ञानिक हथियारों' का उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा अदृश्य युद्ध है जहाँ युवा को लड़ना तो सिखाया जाता है, लेकिन एक ऐसी दिशा में जहाँ कोई मंज़िल ही नहीं है।

इस मनोवैज्ञानिक घेराबंदी का पहला और सबसे घातक हथियार है—'इंतज़ार' का जाल। विज्ञापन निकालना, फिर परीक्षा में देरी करना, फिर पेपर लीक का ड्रामा और अंततः वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर कटवाना; यह महज़ प्रशासनिक अकुशलता नहीं है। यह युवाओं को थकाने की एक सोची-समझी रणनीति है। मनोविज्ञान कहता है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक अनिश्चितता और इंतज़ार की कतार में खड़ा रखा जाए, तो उसकी क्रांतिकारी चेतना धीरे-धीरे 'हताशा' और 'बेबसी' में बदल जाती है। थका हुआ युवा व्यवस्था को बदलने का सपना देखना छोड़कर, महज़ एक 'प्रवेश-पत्र' की भीख मांगने लगता है।

दूसरा प्रहार युवा के 'आत्म-सम्मान' पर किया जाता है। व्यवस्था ऐसा परिवेश निर्मित करती है जहाँ युवा अपनी असफलता के लिए केवल स्वयं को दोषी मानने लगता है। "तुमने 18 घंटे पढ़ाई नहीं की," "तुम्हारे त्याग में कमी थी"—ऐसे जुमले उसके मन में 'सेल्फ-गिल्ट' (आत्म-ग्लानि) भर देते हैं। वह यह भूल जाता है कि जिस परीक्षा में सफलता की दर एक प्रतिशत से भी कम हो, वहाँ दोष उसकी मेहनत का नहीं बल्कि उस 'अलोकतांत्रिक चयन प्रक्रिया' का है। जब युवा खुद को 'नाकाबिल' समझने लगता है, तो वह व्यवस्था की कमियों पर उंगली उठाना बंद कर देता है।

इतना ही नहीं, युवाओं की नैसर्गिक ऊर्जा को भटकाने के लिए कृत्रिम 'शत्रुओं' और 'विवादों' का निर्माण किया जाता है। जब युवा अपनी बेरोज़गारी, शिक्षा के गिरते स्तर और भविष्य के अंधकार पर सवाल पूछने की स्थिति में होता है, तब उसके मनोविज्ञान को 'सांप्रदायिक' या 'छद्म-राष्ट्रवादी' विमर्श की ओर मोड़ दिया जाता है। उसे अहसास दिलाया जाता है कि उसका अस्तित्व खतरे में है। भय का यह मनोविज्ञान उसे इतना डरा देता है कि उसे अपने पेट की भूख और करियर की तबाही भी छोटी लगने लगती है। वह हाथ में झंडा थामे भीड़ का हिस्सा बन जाता है, जबकि सत्ता उसके भविष्य की नींव खोद रही होती है।

मुफ्तखोरी और 'अहसान' का मनोविज्ञान इस युद्ध का अंतिम प्रहार है। दो हज़ार की किश्त या मुफ्त राशन का पैकेट केवल आर्थिक मदद नहीं है, यह एक मनोवैज्ञानिक 'अहसान का बोझ' है। मनोविज्ञान की दृष्टि में, एक बार जब नागरिक सरकार को अपना 'अन्नदाता' मानने लगता है, तो उसकी आलोचनात्मक बुद्धि (Critical Thinking) मर जाती है। वह 'अधिकार' मांगना छोड़कर 'कृपा' की प्रतीक्षा करने लगता है। एक 'आश्रित' मस्तिष्क कभी स्वतंत्र विचार नहीं कर सकता और न ही वह सत्ता से जवाबदेही मांग सकता है।

अंततः, लगातार होने वाले 'इवेंट्स' और 'उत्सवों' के शोर में युवाओं की सिसकियों को दबा दिया जाता है। भीड़ का मनोविज्ञान व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत पीड़ा भुलाने के लिए प्रेरित करता है। जब चारों ओर जश्न का माहौल हो, तो बेरोज़गार युवा को लगता है कि शायद वही अकेला 'असफल' है और बाकी सब खुश हैं। यह अकेलापन उसे और अधिक तोड़ देता है। यह अध्याय हमें चेतावनी देता है कि यदि हमने इस मनोवैज्ञानिक दासता को नहीं समझा, तो हम केवल एक 'वोट बैंक' बनकर रह जाएंगे, जिसका उपयोग तो होगा, पर उत्थान कभी नहीं।



 आत्मबोध : पिंजरे से उड़ान तक

इस पूरी वैचारिक यात्रा का निष्कर्ष केवल व्यवस्था की कमियाँ गिनाना नहीं है, बल्कि उस 'जड़ता' को पहचानना है जिसने हमारी चेतना को बंधक बना लिया है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस 'सुरक्षा' के पिंजरे को हम अपनी मंज़िल समझ बैठे हैं, वह वास्तव में हमारी प्रतिभा की ढलान है। जब तक सफलता का अर्थ केवल 'सरकारी ठप्पा' रहेगा, तब तक राष्ट्र की मेधा इसी तरह किश्तों में खुदकुशी करती रहेगी। यह समय आत्म-ग्लानि में डूबने का नहीं, बल्कि 'आत्मबोध' के साथ जागने का है।

युवाओं को यह समझना होगा कि वे केवल 'वोट बैंक' या 'परीक्षा के रोल नंबर' नहीं हैं, बल्कि वे हाड़-मांस के वे जीवित मनुष्य हैं जिनके पास सृजन की असीमित शक्ति है। व्यवस्था आपको 'इंतज़ार' के मनोविज्ञान में उलझाएगी, आपको 'मुफ्तखोरी' का आदी बनाएगी और आपको 'रट्टू तोता' बनने पर मजबूर करेगी। लेकिन, इस चक्रव्यूह को तोड़ने का एकमात्र रास्ता है—अपनी मौलिकता को पहचानना। कौशल (Skill) और नवाचार (Innovation) ही वे अस्त्र हैं, जो आपको सत्ता की 'खैरात' पर निर्भर होने से बचा सकते हैं।

हकीकत यह है कि कोई भी सरकार लाखों युवाओं को मेज और कुर्सी वाली नौकरी नहीं दे सकती, और न ही यह किसी प्रगतिशील समाज का लक्षण है। असली प्रगति तब होती है जब युवा 'नौकरी मांगने' वाली कतार से बाहर निकलकर 'अवसर पैदा करने' वाले साहसी पथ पर चलता है। जब हम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ की सूचनाएं रटने के बजाय, कुछ नया सीखने और रचने में लगाएंगे, तभी हम इस 'बौद्धिक गुलामी' की ज़ंजीरें काट पाएंगे।

राष्ट्र-निर्माण का अर्थ केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करना नहीं है। राष्ट्र तब बनता है जब उसके नागरिक स्वतंत्र विचारक हों, जब उनके पास सवाल पूछने का साहस हो और जब वे अपनी 'मेहनत' की कीमत दो हज़ार की किश्त के बदले न लगाएं। 'आत्मबोध' का अर्थ ही यही है कि आप जान सकें कि आपकी जवानी 'चुनावी ईंधन' बनने के लिए नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक क्रांति लाने के लिए है। व्यवस्था आपको भटकाएगी, पर आपको अपनी आँखों पर चढ़ी 'सम्मोहन की पट्टी' खुद उतारनी होगी।


अंततः, यह लेख उन सभी युवाओं को एक पुकार है जो डिग्रियों के इस कब्रिस्तान में अपनी पहचान खोज रहे हैं। अपनी डिग्रियों को अपनी मेधा की 'शोक-पटिका' मत बनने दीजिए। उठिए, अपनी रचनात्मकता को पहचानिए और इस 'क्लर्क मानसिकता' से बाहर निकलिए। जिस दिन आप 'सुरक्षा' के मोह को त्यागकर 'सृजन' के जोखिम से प्यार करने लगेंगे, उसी दिन से आपकी वास्तविक प्रगति शुरू होगी। 'आत्मबोध' ही वह उजाला है, जो इस बेरोज़गारी के अंधेरे को चीरकर एक नए और स्वाभिमानी भारत की नींव रखेगा।


पाठकों से संवाद: आपकी अपनी 'आत्मबोध' यात्रा

नीचे दिए गए सवाल केवल प्रश्न नहीं, बल्कि एक दर्पण हैं। मैं चाहूँगी कि आप इन पर विचार करें और अपनी राय साझा करें:

स्वर्णिम काल की बलि : क्या आपको भी लगता है कि आपकी उम्र का सबसे रचनात्मक समय (20 से 35 वर्ष) केवल 'अगले विज्ञापन' और 'रिजल्ट' के इंतज़ार में धुंधला रहा है?

सुरक्षा का पिंजरा : यदि आपको 'सरकारी सुरक्षा' और 'अपने मौलिक सपने' में से किसी एक को चुनना हो, तो समाज आपको क्या चुनने के लिए मजबूर कर रहा है?

मुफ्तखोरी बनाम आत्मसम्मान: क्या आपको महसूस होता है कि 'मुफ्त की किश्तें' धीरे-धीरे हमारे युवाओं के भीतर से सवाल पूछने और संघर्ष करने की शक्ति को खत्म कर रही हैं?

"अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स (Comment Box) में ज़रूर साझा करें। आपकी एक प्रतिक्रिया किसी सोई हुई चेतना को जगाने का माध्यम बन सकती है।"

                                                                                                                      --- मनीषा 



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