जीते जी मरने की कला : अंत या एक अनंत शुरुआत?
| "जब तक पुराना बीज मिट्टी में मिलकर खुद को खत्म नहीं करता, तब तक एक विशाल वृक्ष का नया जन्म संभव नहीं है। आइए, आज अपनी ही अर्थी को कंधा देकर देखें कि उस पार किस तरह का सवेरा हमारा इंतज़ार कर रहा है।" |
'जीते जी मरने की कला' का अर्थ खुद को खत्म करना नहीं, बल्कि उस 'झूठे मैं' को मार देना है जिसे दुनिया ने हम पर थोपा है। बचपन से ही हमें एक साँचे में ढालने की कोशिश शुरू हो जाती है। हमें सिखाया जाता है कि मुस्कुराना कब है, रोना कहाँ है और किस तरह की सफलता पर गर्व करना है। इस पूरी प्रक्रिया में, हम वह 'असली इंसान' कहीं खो देते हैं जो निर्भीक था और जिसके पास अपनी मौलिक दृष्टि थी। अपनी असलियत को दुनिया की नज़रों से छुपाना ही हमारी पहली मौत है। हम चौबीस घंटे एक ऐसा चेहरा लेकर घूमते हैं जो बाज़ार को पसंद आए, जो सोशल मीडिया के मानदंडों पर खरा उतरे। याद रखिये, इंसान मरता तब नहीं जब उसकी धड़कन रुकती है, इंसान तब मर जाता है जब उसके भीतर सच कहने की हिम्मत दम तोड़ देती है।
आज का दौर 'दिखावे' का दौर है। हम खुश होने से ज़्यादा 'खुश दिखने' की कोशिश में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। यह दिखावा एक दीमक की तरह है जो हमारे अस्तित्व को अंदर से खोखला कर देता है। जब हम अपनी खुशियों की चाबी दूसरों के हाथों में सौंप देते हैं, तब। हम एक जीवित इकाई न रहकर महज़ एक 'प्रतिक्रिया' बनकर रह जाते हैं। जीते जी मरने का सबसे अनिवार्य पड़ाव यही है—अपनी उस छवि को सरेआम मार देना जो हमने सिर्फ तालियों की गूँज सुनने के लिए गढ़ी है। अजीब विडंबना है कि हम एक 'जीवंत लाश' की तरह उस करियर या उस पहचान को ढो रहे हैं जिसमें हमारा दम घुटता है। हम मरने से डरते हैं, पर असल में हम कभी जी भी तो नहीं रहे!
इंसान सबसे ज़्यादा 'खोने' से डरता है—पद, प्रतिष्ठा, रिश्ते या संपत्ति। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिसे हम सुरक्षा समझते हैं, वही हमारे पैरों की बेड़ी बन जाती है। सुरक्षा की तलाश ही हमारे भीतर के साहसी इंसान की हत्या कर देती है। अक्सर हम ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े या चंद कागज़ों की खातिर अपना पूरा जीवन 'मृत' होकर गुज़ार देते हैं, यह भूलकर कि अंत में ज़मीन ही हमें निगल लेगी। जब हम मानसिक रूप से यह स्वीकार कर लेते हैं कि "मैं पहले ही मर चुका हूँ, अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं," तो वह निडरता पैदा होती है जो हमें सामान्य से परे ले जाती है। अपनी ही चिता पर बैठकर अपने इस पूरे तमाशे को एक तटस्थ दर्शक की तरह देखना ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है।
हमारी चिंताओं का केंद्र या तो वह अतीत है जो अब धूल बन चुका है, या वह भविष्य जो अभी गर्भ में भी नहीं है। वर्तमान के इस एक क्षण में पूरी तरह विलीन हो जाना ही वास्तव में 'अहंकार की मृत्यु' और 'चेतना का जन्म' है। शब्द अक्सर झूठ बोलते हैं, लेकिन मौन सत्य होता है। हमने शोर को ही जीवन मान लिया है, जबकि सारी सृजनात्मकता मौन की कोख से जन्म लेती है। अपनी इच्छाओं के निरंतर शोर को शांत करना ही वह कला है जिसे ऋषियों ने 'समाधि' और सूफियों ने 'फना' कहा है। यह फना होना मिटना नहीं, बल्कि विराट में मिल जाना है।
अंततः, 'जीते जी मरना' कोई नकारात्मक विचार नहीं है, बल्कि यह जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने का एकमात्र द्वार है। जब हम अपनी वासनाओं और समाज द्वारा दी गई 'उधार की पहचान' को त्याग देते हैं, तब हमारे भीतर एक ऐसे मनुष्य का जन्म होता है जो निर्भय है। जो जीते जी मरना सीख गया, मृत्यु उसके पास आकर हाथ जोड़ती है क्योंकि वह उसे फिर कभी मार नहीं सकती। जिस दिन आप अपनी आँखों में आँखें डालकर यह कह सकेंगे कि "दुनिया की कोई भी चीज़ अब मुझे डरा या लुभा नहीं सकती," समझ लीजिएगा कि आपने मरने की कला सीख ली है। वह मनुष्य अमर हो जाता है—अपनी स्मृतियों में नहीं, बल्कि अपनी जीवंतता में। श्मशान की आग सिर्फ शरीर जलाती है, लेकिन आत्मबोध की आग जीते-जी हमारे 'झूठ' को जलाकर हमें शुद्ध कुंदन बना देती है।
संवाद:
"अक्सर हम दूसरों की नज़रों में ऊँचा उठने के लिए खुद को मार देते हैं। इस लेख पर आपकी क्या राय है? क्या आप भी 'नया जन्म' लेने का साहस रखते हैं? आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा।"
---- मनीषा
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